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प्रदीप सारंग संस्मरण ग्रंथावली
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प्रदीप सारंग संस्मरण संकलन • अध्याय ३ / १४
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अवधी गद्य

झरिहख

आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही।

account_circle लेखक: प्रदीप सारंग
event 18 Oct 2026
pin_drop कमरावां, बाराबंकी (उ.प्र.)
schedule 12 min read
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झरिहख
photo_camera आलेख प्रमुख दृश्य • प्रदीप सारंग संग्रह उच्च-रिज़ॉल्यूशन मूल छायाचित्र

झरिहख आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही। ईका येकु कारन इहौ रहा कि हम घर की छत पर बने सीमेंटेड-टीन सेट के नीचे सोइत है। पानी की बड़ी बड़ी बूँदन के टीनसेट पर गिरै से यही तिना केर, झमझम-झमझम आवाज निकरत रही। आजु कुछ अलग तिना केरी आवाज से कुछ अटपट लाग और जल्दिन खुमारी भागिगै। हमका लाग कि आजु जानौ झरिहख परि जाई। बाकी दिनन मा जागि जाय के बादिव कुछ देर आँखी बन्द किये लेटे रहित रहै अउर मेर-मेर की चिरइन केर कलरव सुना करित रहै। हमरी घरैतिन रोजै छत पर याक बरतन मा पानी भरि देती हैं अउर राति केर बची बासी चावल, रोटी रखि दियत हैं। जौन दिन बासी नहीं बचत है उइ दिन चावल के खंढा यानी कनकी रखि दियत हैं। जेहिका चुगै मेर-मेर की चिरई अउती हैं। नाश्ता भोजन करती हैं अउर जलपान करती हैं। दाना चुगै मा लगातार चह-चहावा करती हैं। यहि तिना जब हम रोज जागित है तब हमरे कानन मा कइव मेर की चिरइन केर कलरव संगीत सुनाय परा करत है। सबै ग्रंथन मा बखान है कि ब्रम्ह मुहूरत मा जागै और उठै का चाही। मुला कइव सालन से हम ग्रंथन केर बातै मानब बन्द करिकै जौन हमरे तईं सही लागत है हम उहै करित है। ईका मतलब ई बिलकुलै नहीं है कि हम ग्रंथन केर अपमान या अवमानना करित है। हमार जरुरतै अइस है कि हमका घंटा भरि दिन चढ़े तक सोवै का परत है। कबौ जल्दी जागि गयेन तौ सोवै केर नौटंकी करै का परत है। हमार डॉक्टर कहत हैं कि कम से कम सात घंटा बिस्तर पर लेटे रहै का चाही। चहै सोऊ चहै सोवै केर नौटंकी करौ। यानी आँखी बंद किहे लेटे रहौ। अक्सर लोग ई तौ देखत हैं कि अतनी बखत तक सोय रहे हैं मुला ई कोऊ नहीं देखत कि कतनी बखत तक जागे हैं। हमरे पास हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स मा सह संपादक का दायित्व है। प्रूफ देखै मा, हेडिंग सुधारै मा, रोजै राति के बारह-साढ़े बारह बजिन जात है, अउर सोवत सोवत येकु। अब येकु बजे सोये के बादि जल्दिन जागब न सम्भव है न उचित। येकु दुइ दिन केर बात हुवै तौ कुछ नहीं, मुला जब रोजै येकु बजी तब सेहत तईं इहै सही है कि देर तलक सोवा जाय। हमरे घर मा न हमका कबौ कहा गवा कि कतनी बखत सोऊ कतनी बखत जागौ अउर न हम अपने लरिकन से कबहूँ कहा है। जब जतनी बखत जीका मन हुवै सोवै जब मन हुवै जागै। लेकिन ईका ई मतलब नहीं है कि हमरे घर मा कोऊ जिम्मेदार नहीं है। सबके सब जिम्मेदार हैं। सब आपन हित-अहित समझत हैं। कोऊ लापरवाह नहीं है। समय केर हिसाब सबके पास रहत है। सबै जानत हैं कि समय जीवन आही। जो समय बेकार करी ऊ आपन जीवन बेकार करी। यही से हमरे घर मा सबै मनमानी से सोवत जागत हैं। तबहिंयु घर की प्रगति मा दिनचर्या मा न कौनिव बाधा न कौनिव दिक्कत। न याक दुसरे से कौनिव शिकायत न याक दूसरे से कौनिव अड़चन। हर कोऊ आपन पूरी जिम्मेदारी ठीक से समझत है यही तईं बड़ी सहजता से सब कुछ होत रहत है। हमका या समझ मिली है गुरुवर डॉ भगवान वत्स जी से। राष्ट्रीय सेवा योजना अउर डॉ वत्स जी की बातन का असर आजु चारि दशक साल बीते के बादिव अगली पीढ़ी तक देखाय परत है। जनपद बाराबंकी सहित आसपास के जनपदन के तमाम लोगन के जीवन पर डॉ भगवान वत्स जी की यही तिना की तमाम सारी बातन का असर है। लोग जबतब चर्चा कीन करत हैं। लोगन के दिल दिमाग मा गुरुवर डॉ वत्स जी तईं अपार श्रद्धा है, पूज्यभाव है। आजु सबेरेन से बारिस होय रही है। 10 बजि रहा है। अबहीं तक देखे से तौ इहै अनुमान है कि आजु झरिहख परी। पिछले कइव दिनन मा आंशिक-झरिहख जइस मौसम रहा है। हम लोगन के छुटपने मा तीन-तीन दिन के झरिहख परत रहैं। हमका ठीक से यादि है कि चिरइन का दाना चुनै भर का समय नहीं मिलत रहा कि निकरि सकैं। लगातार फुहार परतै रहा करत रहै। दुइ-दुइ, तीनि-तीनि दिन तक चिरइन केर उपास होइ जात रहा। कइव साल बादि अबकी लागत है कि झरिहख जस परी। गाँव से न जुड़े रहै वाले अउर अवधी न बोलै समझै वाले लोगन तईं झरिहख नवा शब्द आही। झरिहख मतलब न पानी बन्द हुवै न बरसबै करै। हल्की हल्की फुहार परा करै। यानी धीमी बारिस होत रहत है। जब ई तिना कै बारिस चारि छः घण्टा होत रहत है तब ई तिना की हल्की बारिस का झरिहख कहा जात है। झरिहख मा सबका दिक्कत होइन जात है। अब तौ कच्चे मकान कमै बचे हैं। हमरे छुटपने मा गाँव भर मा दुई चारि घर छोड़ि कै सबके घर कच्चेन हुवत रहे। जब जब झरिहख परत रहा तब तब हर गाँव मा दुई चारि दीवालै जरूर गिरि जाती रहैं। दुई-तीनि दिन के झरिहख मा लोग घर से निकरै न पावैं तब लोग ऊबि जात रहे। मेहरूवा भरि जुटि कै डेलवा नोइया बीना करैं। ई से उनका मन लाग रहै। मनई भला का करैं ? इनहूँ लोग सुरा बघ्घी खेला करैं, कुछ जने ताश खेला करैं, कुछ जने झव्वा बीना करैं। जब बहुत जने एकट्ठा हुवैं तौ समय काटै तईं अक्सर किस्सा किहानी हुवैं। कुछ जने आल्हा बिरहा गावा सुनावा करैं। याक बात अउर कि अगर कोऊ के घर मा कौनिव व्याधि आई तौ लोगन का पता रहत रहा कि कहाँ कहाँ कीके कीके द्वारे लोग इकट्ठा रहत हैं। घरन-घरन बतावै नहीं जाय का परै यक्कै जगह बताय दीन जाय। तुरन्ते दस- पंद्रह लोग मदद तईं चलि परैं। हर गाँव मा येकु दुई लोग बड़े मनई होत रहैं। बड़े मतलब सेठ या जमींदार। उनके दुपलहा-बंगला या बड़ा छप्पर होतै रहा। वैसे तौ अइस बड़े लोगन के द्वारे रोजै दुइ-चारि मनई बैठिन रहत रहे। मुला झरिहख मा बीसन मनई सबेरेन आय जाँय अउर साँझि तक बैठि रहैं। ई बड़कयेन के घर से लइया चना, जोंधरी के लावा, सेतुवा आदि ज्यादा मात्रा मा आवै तौ सब जने खाँय-चबाँय। कुछ जने सिरफ यही तईं आय जात रहे कि उनके घर मा दुपहर कै खुराक बचि जाई। बल्कि घर मा बताय कै निकरत रहे कि दुपहर का खाना सेठ के हियाँ खाब। तब गैस चूल्हा केर ईजाद नहीं भवा रहै यहिसे सबके घरन मा खाना चूल्हे पर बनत रहा। झरिहख मा सूखि लकड़ी खतम होइ जाय। जतनी लकड़ी बाहर रहत रही वा सब भीजि जात रही। बहुत कम लोगन के घर मा लकड़ी रखै भर की जगह रहत रही। ज्यादातर लोगन के याक कोठरी हुवा करत रही बाकी छपरा नीचे जिनगी बीतत रही। हमका याद है कि कपड़ा नहीं सूखत रहे। जाँघिया का आगि मा सेंकि सेंकि पहिनै का परत रहा। अम्मा जब खाना बनाय चुकैं तब चूल्हे कै आगि बाहर निकारि कै रखि दियैं तब हम सब आपनि आपनि कपड़ा सेंकि कै सुखाइत रहै। जो कपड़ा सेंकै मा चूकि जाय यानी ओदि-गीलि पहिनि लियै तौ ऊके दाद होइन जात रहा। हमका याद है कि सुबह शाम दिशा-मैदान जाय तईं खादि की बोरिया या शककरहे बोरा केर हुड्ड बनाय कै ओढ़ि कै जावा जात रहै। कुल मिलाय कै 90 प्रतिशत घरन मा उपास होइ जात रहा। कौनिव तिना आलू अउर सेतुवा के सहारे काम चलावा जात रहा। अक्सर चिल्ला बनि जाँय, लपसी या बरिया बनि जाय। यही तिना तीनि चारि दिन के झरिहख पार होत रहे। हरहा गोरुन का चारा कै दिक्कत होइ जात रही। जौन घरन के जानवर याक बखत चरै जात रहे सिरफ याकै बखत भूसा चारा खात रहे। अब उनहूँ जानवरन का दुनहूँ बखत चारा भूसा देय का परत रहा। दिन भरि यक्कै जगह बाँधे-बाँधे हरहौ ऊबिन जात रहे। चिरइन तईं तौ बहुतै बड़ी समस्या आय जाय। न भीजत भये कहूँ निकरि सकैं। न उनके दर पर खाना मिलि सकै। याक कहावतौ है कि सावन मा सुआ उपास करत हैं। ज्यादातर पक्के घरन मा गौरैया तिलोरी रहती रहीं। खाना बनावत समय ई पक्के घरन की मेहरुवै कुछ चावल या कनकी बिथराय देत रहीं जेहिसे मौका मिलतै भर्र मारि कै चिरई कूदि परैं अउर बड़े उल्लास से चुनैं। ई देखि कै मन खुश होइ जात रहा। कुछ काम-धाम रहत नहीं रहा यहिसे तमाम लोग दिन राति सोवा करैं। सबके घरन मा रेडियो तक नही होत रहे। जिनके घरन मा रहे उनका बहुत समय रेडियो सुनै मा कटि जात रहा। सबसे बड़ी समस्या तब होत रही जब झरिहख मा कोऊ कै तबियत खराब होइ जाय। बैलगाड़ी पर बरसाती पन्नी छाय कै डॉक्टर के यहाँ लै जाय का परत रहा। यहिसे बड़ी समस्या तब आवै जब कोऊ केर मौत होइ जाय। जलावै तईं सूखि लकड़ी न मिलै। दफ़नावै मा पानी निकरि आवै। बस कौनिव तिना काम बनावा जाय। झरिहख मा अतना पानी गिरत रहा कि बाढ़ जइस हालात बनि जात रहे। जिनके घर कच्चे हुवत रहे उई दिनराति देवी देउता सुमिरा-मनावा करैं। दुई चारि गाँव मा सुनाइन परि जाय कि फलाँ गाँव मा देवार गिरी एक लोग दबि कै मरे। का मनई का जानवर ई झरिहख से सबै ऊबि जाँय। झरिहख मा चहै जनम हुवै चहै मौत, पूरा टोला-मुहल्ला परेशान होइ जात रहा। हम तौ आजौ मनायित है कि बारिस चहै जतनी हुवै मुला झरिहख न परै। गरीबन केर तौ दुश्मनै आही झरिहखु।

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— प्रदीप सारंग

कमरवाँ, सतरिख (बाराबंकी) • संस्मरण संकलन
प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
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ग्रंथ अनुक्रमणिका

कुल १४ आलेख व अध्याय
१
आलेख

कुछ अच्छे लोग

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२
अवधी गद्य

अवधी किहानी, सुघरी -2

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३
अवधी गद्य

झरिहख

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४
हिंदी पद्य

दोहे- "नारी"

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५
आलेख

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट

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६
आलेख

मैं फेल हुआ या पास....?

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७
आलेख

विचलन बनाम छतिपूर्ति

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८
आलेख

छात्रों में उच्च मानवीय मूल्य और रेडक्रास

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९
आलेख

एक जरुरी गहन चिन्तन, भारत और भारतीयता

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१०
आलेख

नृत्य द्वारा उठाया जाता है - देवी-देवताओं के वाहन से जुड़े रहस्य से पर्दा

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११
आलेख

कैसे बनें पत्रकार, जानें कुछ जरूरी बातें

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१२
आलेख

भूख, भोजन, भीख और भ्रष्टाचार

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१३
आलेख

स्त्री बनाम पुरूष

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१४
अवधी गद्य

सुघरी

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प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
translate अवधी लोक-शब्दावली मंजूषा (Awadhi Lexicon)

इस संस्मरण में प्रयुक्त ठेठ अवधी शब्दों के अर्थ

बाराबंकी जनपद की बोलचाल से संकलित
झरिहख संज्ञा • Awadhi

अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।

घरैतिन संज्ञा • Awadhi

गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।

कनकी संज्ञा • Awadhi

चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।

हरहा गोरु संज्ञा • Awadhi

हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।

सुरा बघ्घी संज्ञा • Awadhi

अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।

ओसारा संज्ञा • Awadhi

मकान के सामने बना बरामदा या छज्जे के नीचे की बैठक जहाँ चौपाल लगती है।

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श्री प्रदीप सारंग

edit_note वरिष्ठ साहित्यकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता location_on ग्राम कमरावां, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश, भारत
40+ वर्ष साहित्य सेवा ग्रीन गैंग संस्थापक
लेखक सोशल मीडिया जुड़ें
psychology_alt साहित्यिक व जमीनी सरोकार

विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।

“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”
— श्री प्रदीप सारंग
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लेखक विचार अस्वीकरण (Editorial & Author Disclaimer)

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार, अनुभव और विश्लेषण पूर्णतः लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। वेबसाइट एवं संपादकीय मंडल आलेख में व्यक्त निजी दृष्टिकोण की स्वतंत्रता का सम्मान करता है। विस्तृत कानूनी शर्तों व नीतियों के लिए कृपया हमारी अस्वीकरण नीति (Disclaimer) एवं संपादकीय नीति (Editorial Policy) देखें।

साहित्य संचयन

स्वीकृत अवधी कृतियाँ व अन्य आलेख

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कुछ अच्छे लोग आलेख
20 Oct 2026 • 8 min read

कुछ अच्छे लोग

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अवधी किहानी, सुघरी -2 अवधी गद्य
20 Oct 2026 • 8 min read

अवधी किहानी, सुघरी -2

अवधी किहानी - सुघरी 2

दोहे- "नारी" हिंदी पद्य
16 Oct 2026 • 8 min read

दोहे- "नारी"

नारी बनाम पुरुष

पाठक प्रतिक्रिया व संस्मरण (Comments)

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२ विचार
वि

विनोद कुमार मिश्र

हैदरगढ़, बाराबंकी • 20 May 2026
verified

"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"

डॉ

डॉ. सुधीर शुक्ला

लखनऊ विश्वविद्यालय • 21 May 2026

"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"

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