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प्रदीप सारंग संस्मरण ग्रंथावली
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प्रदीप सारंग संस्मरण संकलन • अध्याय १ / १४
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आलेख

कुछ अच्छे लोग

संस्मरण मेरठ यात्रा

account_circle लेखक: प्रदीप सारंग
event 20 Oct 2026
pin_drop कमरावां, बाराबंकी (उ.प्र.)
schedule 12 min read
spa

◆कुछ अच्छे लोग◆

============


प्रदीप सारंग

9919007190


        आज 18 अक्टूबर 2026 को मेरे साथ घटित एक सुन्दर और लाजवाब घटना के आधार पर कहा जा सकता है कि हर जगह, दुनिया के कोने कोने में कुछ अच्छे लोग होते ही हैं, जो बिखेरते रहते हैं अपनी सुगंध बिना किसी चाह के। चाह होती भी होगी तो शायद यही कि इंसान हैं तो इंसान बने रहेंगे और समय-समय पर अपने को सिद्ध भी करते रहेंगे कि वे इंसान हैं।

       आज 18 अक्टूबर 2026 को आयोज्य अंतरराष्ट्रीय मैगजीन- सक्सेज स्टोरी के लोकार्पण एवं सम्मान समारोह में आमंत्रित होकर कैसरबाग लखनऊ बस स्टेशन से रात 10 बजे की ऐसी बस द्वारा प्रातः मेरठ पहुँचा। ऑटो से शास्त्री नगर पहुँच गए। अब बारी थी पैदल चलने की। हमने सोचा कि कार्यक्रम स्थल पर पहुँचकर वहीं समय बिताएंगे। कई जगह पूछते हुए गंतव्य तक पहुँचा तो आयोजन स्थल स्टूडियो बन्द मिला। फिर पता चला कि आज संडे है तो कार्यक्रम स्थल पर 2 बजे ही इंट्री मिलेगी।स्टूडियो 2 बजे ही खुलेगा। तो हम वापिस होकर पड़ोस स्थित पार्क में समय बिताने का निर्णय लिया। 

        बात सुबह 8 बजे की है जब मैं उत्तर प्रदेश मेरठ के शास्त्री नगर स्थित अंबेडकर पार्क के पास पहुँच कर एक चाय की छोटी सी दुकान पर पार्क में इंट्री हेतु प्रवेश द्वार पूछा कि किधर है। तो एक सज्जन ने पूछा कि क्या आप स्टूडियो खोज नहीं पाए। यह कहते हुए वे उठकर मेरे पास आ गए। तब हमने ध्यान दिया कि कुछ ही देर पहले चौराहे पर आप से हमने रास्ता पूछा था। हमने पूरी बात बताई। तो वे बोले कि चाय पीजिए। हमने मना किया तो पानी पूछ लिया, हमारी स्वीकृति के बाद उन्होंने एक बोतल पानी खरीदा और हमें बोतल पकड़ाने लगे। हमने कहा कि अरे पैसे हम देंगे फिर। तो बोले कि  आप बाहर से आये हैं। चाय पानी तो हमारा फर्ज है। चंद पलों की मुलाकात और फर्ज की बात। वे नहीं माने बोतल हमें पकड़ा ही दी। हमने नाम जानना चाहा तो टाल गए कि नाम में क्या। क्या करते हैं तो बताया कि एक रेडीमेड कपड़ा कम्पनी में प्रेस का कार्य करते हैं। नाम न बताकर, बिना बोले ही उन्होंने एक लम्बे और गहरे दर्शन को प्रस्तुत कर दिया था। समझना न समझना सामने वाले पर निर्भर था। 

हमने धन्यवाद बोला तो भी कहा कि अरे आप बुजुर्ग हैं धन्यवाद अच्छा नहीं लगता। एक और गहरे दर्शन की झलक। मैं निःशब्द, चुपचाप विनम्र-भाव की मुद्रा में सिर्फ हल्का झुकर दोनों हाथ जोड़कर नमन किया और चल पड़े पार्क के इंट्री गेट की ओर।

         इस अंबेडकर पार्क में बिना टिकट इंट्री थी। पार्क टहलते हम सोचने लगे कि क्या सोचकर बंदे ने पानी बोतल खरीद कर दे दी। मेरे कपड़े इस स्तर के थे कि अक्षम समझकर दया भाव से दिया हो ऐसा नहीं था। फिर क्या था? चिंतन का विषय मेरे सामने था। हमने समझा इस बंदे में इंसान होने के सारे गुण मौजूद हैं। शायद उसने इसलिए चाय पानी पूछा कि बाहर शहर से कोई उनके शहर आया है तो पूछना उनका फर्ज है। हमने सोचा कि इस बंदे ने इंसान होने का फर्ज पूरा किया तो अब इंसान बनकर मुझे अपने फर्ज पूरे करने थे। गहरा एहसास था मुझे कि शायद उसने मुझसे यह कह दिया था कि हमारे शहर और पार्क को आप गंदा नहीं करेंगे। हमने पूरा ध्यान रखा कि पूरी यात्रा में हमने बिस्किट खाये, केला खाये, दालमोट के पैकेट भी निपटाए लेकिन हम अपने द्वारा उत्पादित कूड़ा कचरा अपने बैग में रखते रहे और जहाँ कूड़ादान मिला उसके हवाले किया।

      छोटा किन्तु हरियाली से भरपूर है अंबेडकर पार्क। इसी के सामने एक और चिल्ड्रन पार्क है जिसका नाम मान्यवर कांशीराम के नाम पर है। यहाँ इस समय 12:00 बजे तक हाईमास्ट लाइट जल रही है। यह नगर पालिकाओं की लापरवाही का प्रमाणपत्र है। बल्कि विद्युत दुरुपयोग की दास्ताँ भी है। 

       पार्क की बनावट बहुत अच्छी है लेकिन वर्तमान में हालत बहुत खस्ता है। बड़ी बड़ी घास वैसे लगी है जैसे लाचार हो चुके किसी बुजुर्ग के चेहरे पर उगी बेरतीब दाढ़ी। काश इस पार्क का नाम कांशीराम न होकर कुछ और होता? लेकिन फिर याद आया कि- सबदिन जात न एक समान। कभी इनके दिन थे आज उनके दिन हैं। मैं पार्क में बैठा बेंच पर लेटा सोंच रहा हूँ और लिख रहा हूँ कि आज भी ऐसे लोग हैं जिनकी सुगंध से जन जगमग है। आज ऐसे भी लोग हैं जिनकी छुद्र सोंच पार्क की बदहाली की शक्ल में दिख रही है। न इस पार्क में किसी विचारधारा के अनुयायियों की रोक है न उस पार्क में। तो यह उपेक्षित भाव क्यों ? सरकार बदलने के साथ हमारे पार्कों की दशा दुर्दशा में तथा बदहाली साजसज्जा में बदलती रहती है। कभी इस मुहल्ले के लोग पार्क की दुर्दशा को झेलते हैं कभी उस मुहल्ले के लोग। 

        आज मुझे मंत्र कहानी के पात्र भगत और डॉ चड्ढा पुनः दिखाई दे गए। एक तरह अपनी सोंच की सुगंध फैला रहा यह अदना सा अनाम व्यक्ति और उसकी अटपटी चाह तथा अपने नाम की चाह पाले, बारी बारी से राजनीति के पदों पर आसीन होने वाले छुद्र सोंच के वे लोग जिनकी सोंच की परिणति स्वरूप बारी बारी से पार्कों की बदहाली।



        

        

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— प्रदीप सारंग

कमरवाँ, सतरिख (बाराबंकी) • संस्मरण संकलन
प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
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ग्रंथ अनुक्रमणिका

कुल १४ आलेख व अध्याय
१
आलेख

कुछ अच्छे लोग

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२
अवधी गद्य

अवधी किहानी, सुघरी -2

10 min read
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३
अवधी गद्य

झरिहख

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४
हिंदी पद्य

दोहे- "नारी"

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५
आलेख

नेग की जबरन वसूली नहीं कर सकेंगे किन्नर-हाईकोर्ट

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६
आलेख

मैं फेल हुआ या पास....?

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७
आलेख

विचलन बनाम छतिपूर्ति

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८
आलेख

छात्रों में उच्च मानवीय मूल्य और रेडक्रास

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९
आलेख

एक जरुरी गहन चिन्तन, भारत और भारतीयता

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१०
आलेख

नृत्य द्वारा उठाया जाता है - देवी-देवताओं के वाहन से जुड़े रहस्य से पर्दा

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११
आलेख

कैसे बनें पत्रकार, जानें कुछ जरूरी बातें

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१२
आलेख

भूख, भोजन, भीख और भ्रष्टाचार

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१३
आलेख

स्त्री बनाम पुरूष

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१४
अवधी गद्य

सुघरी

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प्रदीप सारंग संस्मरण डिजिटल ग्रंथावली (संस्करण 2026)
translate अवधी लोक-शब्दावली मंजूषा (Awadhi Lexicon)

इस संस्मरण में प्रयुक्त ठेठ अवधी शब्दों के अर्थ

बाराबंकी जनपद की बोलचाल से संकलित
हरियाली संज्ञा • Awadhi

प्राकृतिक पेड़-पौधे और वृक्षारोपण से फैली समृद्ध प्राकृतिक संपदा।

झरिहख संज्ञा • Awadhi

अनवरत कई दिनों तक चलने वाली लगातार धीमी फुहार व मूसलाधार बारिश।

घरैतिन संज्ञा • Awadhi

गृहस्वामिनी, घर की मालकिन अथवा धर्मपत्नी के लिए आदरसूचक शब्द।

कनकी संज्ञा • Awadhi

चावल का खंडित टुकड़ा (खंढा), जो पक्षियों को चुगाने के काम आता है।

हरहा गोरु संज्ञा • Awadhi

हल जोतने वाले बैल एवं मवेशी जानवर, जो खूंटे पर बंधे रहते हैं।

सुरा बघ्घी संज्ञा • Awadhi

अवध क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक चौपाल खेल (बकरी और बाघ का खेल)।

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श्री प्रदीप सारंग

edit_note वरिष्ठ साहित्यकार एवं पर्यावरण कार्यकर्ता location_on ग्राम कमरावां, जिला बाराबंकी, उत्तर प्रदेश, भारत
40+ वर्ष साहित्य सेवा ग्रीन गैंग संस्थापक
लेखक सोशल मीडिया जुड़ें
psychology_alt साहित्यिक व जमीनी सरोकार

विगत चार दशकों से अवधी साहित्य की समृद्ध वाचिक परंपरा के संवर्धन और ग्रामीण पर्यावरण के पुनर्जीवन में संलग्न। हिंदी दैनिक समाचार पत्र सन्दौली टाइम्स के सह-संपादक के रूप में निरंतर पत्रकारिता के सरोकारों को जीने वाले सारंग जी ने बाराबंकी की मिट्टी, तालाबों और वृक्षों के संरक्षण हेतु युवाओं की 'ग्रीन गैंग' का नेतृत्व किया है।

“हारना सीखा नहीं है, जीत का मैं गीत हूँ। जुगनुओं का संग है, इंसानियत का मीत हूँ।”
— श्री प्रदीप सारंग
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साहित्य संचयन

स्वीकृत अवधी कृतियाँ व अन्य आलेख

सभी स्वीकृत आलेख देखें arrow_forward
अवधी किहानी, सुघरी -2 अवधी गद्य
20 Oct 2026 • 8 min read

अवधी किहानी, सुघरी -2

अवधी किहानी - सुघरी 2

झरिहख अवधी गद्य
18 Oct 2026 • 8 min read

झरिहख

आजु जब हम सोय कै जागेन, तौ झमाझम बारिस होत रही। झमाझम मतलब वाकई झम-झम, झम-झम कै आवाज कानन मा सुनाय परत रही।

दोहे- "नारी" हिंदी पद्य
16 Oct 2026 • 8 min read

दोहे- "नारी"

नारी बनाम पुरुष

पाठक प्रतिक्रिया व संस्मरण (Comments)

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२ विचार
वि

विनोद कुमार मिश्र

हैदरगढ़, बाराबंकी • 20 May 2026
verified

"सारंग दादा! आपने 'झरिहख' शब्द के साथ पूरे बचपन को आँगन में ला खड़ा किया। वह टीनशेड पर बूँदों का शोर, अम्मा का चूल्हे की बची आग बाहर निकाल कर कपड़े सेंकना... आज सीमेंट के कमरों में वह सोंधी खुशबू और वह अपनापा कहीं खो गया है। अवधी गद्य में ऐसा प्रामाणिक चित्रण विरले ही मिलता है।"

डॉ

डॉ. सुधीर शुक्ला

लखनऊ विश्वविद्यालय • 21 May 2026

"श्रद्धेय डॉ. भगवान वत्स जी के प्रति व्यक्त आदर और राष्ट्रीय सेवा योजना की वह दृष्टि आज भी आपकी जीवनशैली में झलकती है। रात को 1 बजे तक अखबार का संपादन और सुबह पक्षियों का कलरव—यह संस्मरण मात्र एक आलेख नहीं, ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक दस्तावेज है।"

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